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सीहोर के युवा कहानीकार को पंकज सुबीर को उनके उपन्यास ये वो सहर तो नहीं के लिये ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार दिया गया है। भारतीय ज्ञानपीठ ने 2009 को उपन्यास वर्ष मनाते हुए नवलेखन पुरस्कार को उपन्यास के लिये दिये जाने की घोषणा की थी । इसके लिये एक चयन समिति शीर्ष आलोचक डॉ. नामवर सिंह की अध्यक्षता में बनाई गई थी । जिसमें डॉ. गंगा प्रसाद विमल, शीर्ष कथाकार, नया ज्ञानोदय के संपादक तथा भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया, आलोचक डॉ. विजय मोहन सिंह, कथाकार चित्रा मुद्गल, कथाकार अखिलेश सम्मिलित थे । । उल्लेखनीय है कि गत वर्ष भी पंकज सुबीर का एक कहानी संग्रह ईस्ट इंडिया कम्पनी भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार योजना के अंतर्गत प्रकाशित होकर आया था, जो साहित्यिक हलकों में काफी चर्चित रहा था । मध्य प्रदेश के जिला मुख्यालय सीहोर के युवा कथाकार पंकज सुबीर की पचास से भी अधिक कहानियां देश भर की साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं । पेशे से स्वतंत्र पत्रकार पंकज सुबीर अपनी विशिष्ट शैली तथा शिल्प के लिये जाने जाते हैं । युवा पीढी क़े नये कथाकारों में अपनी व्यंग्य निहित भाषा से वे अपनी अलग ही पहचान बन चुके हैं । उनको जिस उपन्यास ये वो सहर तो नहीं के लिये ये पुरस्कार दिया जा रहा है उसमें उन्होंने 1857 से लेकर 2008 तक की कथा को व्यंग्य निहित भाषा में समेटा है । इस उपन्यास में दो समानांतर कथाओं को समेटने की कोशिश की गई है । पहली कथा में 1857 के दौरान सीहोर में हुए सिपाही विद्रोह तथा सिपाही बहादुर सरकार की कथा के माध्यम से उस पूरे कालखंड की व्यापक पड़ताल की की गई है । उसके बाद उसी कथा को देश की वर्तमान व्यवस्था से तालमेल बिठाने का प्रयास किया गया है जिसमें पत्रकारिता, प्रशासन तथा राजनीति का घालमेल दिखाया गया है ।
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